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काव्य चर्चा

आवाहन

Sumit Pareek

4 कविताएं

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न डर सका है तू उन सहस्त्रबाहों से ।
न डरा तू उन शैतानों से।
कुछ तो तू अपना भान कर
कुछ तो अपने उस कुल का सम्मान कर
जिसके आगे पर्वत भी झुक जाता था।
जिसके सामने सागर भी शीश नवाता था।
तू क्यों डरता है मन के इन छोटे से शैतानों से
तेरा यहा नहीं कहीं और ठिकाना है
इनको तेरे आगे यूं ही उड़ जाना है
आज फिर से नये युग का संचार कर
आ और फिर परशु का आव्हान कर।
और फिर से एक नए युग का तू संवाहन कर।
आ उठ चल तुझे कोई न डिगा पाएगा
फिर से वो युग वापस आएगा।
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