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Sad ghazal bhare jahan mein mera yaar tha hi nahin

इरशाद

मेहदी हसन की गायी ग़ज़ल 'भरे जहाँ में कोई मेरा यार था ही नहीं किसी नज़र को मेरा इंतज़ार था ही नहीं'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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इस ग़ज़ल को मेहदी हसन ने अपनी आवाज़ दी थी। 

भरे जहाँ में कोई मेरा यार था ही नहीं
किसी नज़र को मेरा इंतज़ार था ही नहीं

ना ढूंढ़िए मेरी आँखों में रतजगों की थकन 
ये दिल किसी के लिए बेक़रार था ही नहीं

सुना रहा हूं मुहब्बत की दास्तां उसको 
मेरी वफ़ा पे जिसे ऐतबार था ही नहीं

क़तील कैसे हवाओं से मांगते ख़ुशबू
हमारी शाम में ज़िक्रे-बहार था ही नहीं
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