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काव्य चर्चा

दीवारे बोलती हैं

PINTU ALLAHABADI

23 कविताएं

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साजिश का लगा पहरा दीवारे बोलती है
छाया है घना कुहरा दीवारे बोलती
दहलीजे तो पैगामे मोहब्बत से भरी लेकिन
आँगन में कुआँ गहरा
दीवारे बोलती है
सबूतों की नहीं कोई कमी है आज भी देखो
शहर कब कब मेरा उजरा
दीवारे बोलती है
तुम्हारे जुर्म की हर इंतहा अब कैद होती है
कैसे लूटा तुमने गजरा
दीवारे बोलती है

ओ सारी गुप्तगु जो बंद कमरे में हुई होगी
कहा बिखरा कोई कजरा
दीवारे बोलती है
तुम्हारा गम समेटू जिंदगी में या ख़ुशी अपनी
तिनका, तिनका, है बिखरा
दीवारे बोलती है
सुनाई देती है अक्सर यहाँ दम तोड़ती चीखे
आंसू बन गए बदरा
दीवारे बोलती है

बादल फिर समंदर में बरस कर हो गए खाली
प्यासा रह गया सहरा
तुम्हे हरगिज बचाने की कसम मै ले नही सकता
बन बैठा हूँ एक मोहरा
दीवारे बोलती है 

-पिंटू इलाहाबादी
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