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Noted Hindi writer Sarveshwar Dayal Saxena was poet of new poetry movement

काव्य चर्चा

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : इब्नबतूता पहन के जूता, निकल पड़े तूफान में

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है
बिन अदालत औ मुवक्किल के मुकदमा पेश है
आँख में दरिया है सबके
दिल में है सबके पहाड़
आदमी भूगोल है जी चाहा नक्शा पेश है
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।


सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी साहित्य जगत के एक ऐसे हस्ताक्षर हैं, जिनकी लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही। चाहे वह कविता हो, गीत हो, नाटक हो अथवा आलेख हों। जितनी कठोरता से उन्होंने व्यवस्था में व्याप्त बुराइयों पर आक्रमण किया, उतनी ही सहजता से वे बाल साहित्य भी रचते रहे। 15 सितंबर 1927 को बस्ती (उ.प्र) में जन्मे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने एक छोटे से कस्बे से अपना जीवन शुरू किया लेकिन जिन रचनात्मक उचाईयों को उन्होंने छुआ, वह अपने आप में ऐतिहासिक है। उनका मानना था कि हमारे पास बच्चों के लिए साहित्य बहुत कम मात्रा में है, इससे बच्चों का भविष्य अधर में होगा। उन्होंने बच्चों के लिए कई कवितायेँ लिखीं - 

इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में

कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता

उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में 


सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कविता की तुकबंदियों से बहुत हद तक अपने को आज़ाद रखते हैं बावजूद इसके कविता के लय में कोई अंतर नहीं आया। 

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना    
और उस संगीत को सुनना

जो धमनियों में बजता है,...
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।

शब्दों की खोज शुरु होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फिसल जाते हैं।

हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
खुद से दुश्मनी ठान लेना है।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ खुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना। 


सर्वेश्वरजी की कविताओं में व्यवस्था के प्रति विरोध है, दलित और वंचित तबकों के लिए जगह है, वे लिखते हैं - 

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं 


उनकी अनुभूतियाँ, तड़प, तकलीफें मिलकर कविता में बदल जाती हैं। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियों में भी नौकरी की, 1964 में जब 'दिनमान' पत्रिका शुरू हुई तो सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' के कहने पर सर्वेश्वरजी दिल्ली आ गए और 'दिनमान' से जुड़ गए। पत्रकारिता में आए तब भी मुखर होकर लिखते रहे और पत्रकारिता में उभरी हुई चुनौतियों को समझते हुए उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाएं युवा पीढ़ी को उत्साहित करती हैं। सर्वेश्वरजी की भाषा आम बोलचाल की भाषा है, यही कारण है कि लोग सहजता से उनके साहित्य से जुड़ पाते हैं। 

आकाश का साफ़ा बाँधकर
सूरज की चिलम खींचता
बैठा है पहाड़,
घुटनों पर पड़ी है नदी चादर-सी,
पास ही दहक रही है
पलाश के जंगल की अँगीठी
अंधकार दूर पूर्व में
सिमटा बैठा है भेड़ों के गल्‍ले-सा।

अचानक- बोला मोर।
जैसे किसी ने आवाज़ दी-
'सुनते हो'
चिलम औंधी
धुआँ उठा-
सूरज डूबा
अंधेरा छा गया। 


उन्होंने नाटक भी लिखे, व्यंग्य विधा में शासकीय शोषण पर तंज करते हुए नाटक 'बकरी' लिखा -
 
बकरी को क्या पता था मशक बन के रहेगी,
अपने खिलाये फ़ूलों से भी कुछ न कहेगी,
उस के ही खूं के रंग से इतराएगा गुलाब,
दे उस की मौत जाएगी हर दिल अज़ीज़ ख़्वाब।


'तीसरा सप्तक', 'काठ की घंटियां', 'बांस का पुल', 'एक सूनी नाव', 'गर्म हवाएं', 'कुआनो नदी', 'जंगल का दर्द', 'खूंटियों पर टंगे लोग', 'क्या कह कर पुकारूं–प्रेम कविताएं' उनकी प्रमुख काव्य रचनाएं हैं। उन्होंने कई नाटक और उपन्यास भी लिखे। 'पागल कुत्तों का मसीहा', 'सोया हुआ जल', 'उड़े हुए रंग', 'कच्ची सड़क', 'अँधेरे पर अँधेरा' उनके उपन्यास हैं। 'बतूता का जूता', 'महंगू की टाई' बाल कवितायेँ हैं। 24 सितंबर 1983 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा।
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