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mother going to out of thinking from society here it is revealed by amar ujala kavya

काव्य चर्चा

और इस तरह मां 'सोच' से होती जा रही है बाहर... 

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्‍ली

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राजकोट में एक बेटे ने अपने मां को छत से फेंक कर मौत के घाट उतार दिया। मां का दोष बस इतना था कि वह ब्रेन हेमरेज का शिकार थी। और बेटा मां को संभाल नहीं पा रहा था। इससे बचने के लिए प्रोफेसर बेटे ने जन्म देने वाली मां को ही मौत दे दी। एक बेटे के लिए मां का इस तरह अप्रासंगिक होना समाज के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है। मानसिक शांति पाने के लिए प्रोफेसर बेटे की यह करतूत समाज के सामने सवालिया निशान खड़े कर रही है। इस घटना के मद्देनजर हम मां पर एक ऐसी कविता पेश कर रहे हैं, जिसमें मां आदमी की 'सोच' से बाहर होते जा रही है। 

मां का अप्रासंगिक होना...

जाती हुई धूप संध्या की
सेंक रही है मां
अपना अप्रासंगिक होना
देख रही है मां

भरा हुआ घर है
नाती पोतों से, बच्चों से
अनबोल बहुओं के बोले
बंद खिड़कियों से
दिन भर पकी उम्र के घुटने
टेक रही है मां

फूली सरसों नहीं रही
अब खेतों में मन के
पिता नहीं हैं अब नस-नस
क्या कंगन सी खनके
रस्ता थकी हुई यादों का
छेंक रही है मां

बुझी बुझी आंखों ने
पर्वत से दिन काटे हैं
कपड़े नहीं अलगनी पर
फैले सन्नाटे हैं
इधर-उधर उड़ती सी नजरें
फेंक रही है मां

-यश मालवीय


 
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