आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   Momin Khan Momin a Maughal era poet known for Urdu ghazals
Momin Khan Momin a Maughal era poet known for Urdu ghazals

काव्य चर्चा

मोमिन खां 'मोमिन' : आख़िरी वक़्त में क्या खाक मुसलमां होंगे 

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

1466 Views
उम्र तो सारी कटी इश्क़े-बुता में मोमिन 
आख़िरी वक़्त में क्या खाक मुसलमां होंगे 


मोमिन खां 'मोमिन' का नाम आते ही मिर्ज़ा ग़ालिब की याद आती है। कहा जाता है कि ग़ालिब ने मोमिन के केवल एक शेर के बदले अपना सारा दीवान देने की पेशकश की थी। 'मोमिन' बहुमुखी व्यक्तित्व वाले शायर थे। संगीत, शतरंज और ज्योतिष के क्षेत्र में भी वे अव्वल थे। 1800 में पैदा हुए 'मोमिन' का ताल्लुक मूलतः कश्मीर से था लेकिन वे दिल्ली आकर बस गए थे। 

तुम भी रहने लगे ख़फ़ा साहब 
कहीं साया मेरा पड़ा साहब 

है ये बंदा ही बेवफ़ा साहब 
ग़ैर और तुम भले भला साहब 

क्यूँ उलझते हो जुम्बिश-ए-लब से 
ख़ैर है मैंने क्या किया साहब। 


अरबी, फ़ारसी और उर्दू के जानकार 'मोमिन' मोहब्बतों वाले शायर थे और अपने जज़्बातों को उन्होंने ग़ज़ल के माध्यम से व्यक्त किया। उन्हें 'हक़ीम ख़ान' भी कहा जाता है क्योंकि वे चिकित्सक भी थे। 

है दिल में ग़ुबार उस के घर अपना न करेंगे 
हम ख़ाक में मिलने की तमन्ना न करेंगे 

क्यूँकर ये कहें मिन्नत-ए-अदा न करेंगे 
क्या-क्या न किया इश्क़ में क्या-क्या न करेंगे 

हँस हँस के वो मुझ से ही मेरे क़त्ल की बातें 
इस तरह से करते हैं कि गोया न करेंगे 


अपनी विशिष्ट फ़ारसी शैली के लिए मशहूर हो चुके शायर 'मोमिन' अपने अल्फ़ाज़ों में रोमांटिक प्रेम का जश्न मनाते मिलते हैं। वे बड़े सुन्दर और फ़क्कड किस्म के इंसान थे। 

तुम हमारे किसी तरह न हुए 
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता 

उस ने क्या जाने क्या किया ले कर 
दिल किसी काम का नहीं होता 

इम्तिहाँ कीजिए मेरा जब तक 
शौक़ ज़ोर-आज़मा नहीं होता


सुंदर वस्त्रों और सुगंध से प्रेम था। इनकी कविता में इनकी इसी प्रकृति तथा सौंदर्य का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। 

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम 
पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम 

हँसते जो देखते हैं किसी को किसी से हम 
मुँह देख-देख रोते हैं किस बेकसी से हम 

हम से न बोलो तुम इसे क्या कहते हैं भला 
इंसाफ़ कीजे पूछते हैं आप ही से हम 


इनकी गजलें भी लोकप्रिय हुईं । उन्होंने बहुत से अच्छे 'वासोख्त' भी लिखे हैं। 'वासोख्त' लंबी कविता होत है जिसमें प्रेमी अपने प्रेमिका की निन्दा और शिकायत बड़े कठोर शब्दों में करता है। 

हाथ पहुंचे भी न थे जुल्फे दोता तक मोमिन 
हथकड़ी डाल दी जालिम ने ख़ता से पहले 


'मोमिन' के शेरों में रंगीनियत है, लेकिन कई शेर बहुत उलझे हुए भी हैं। वह मिर्ज़ा ग़ालिब और जौक के समकालीन थे। आज उनकी मजार दिल्ली के मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज के नज़दीक पार्किंग क्षेत्र के पास है।

वो जो हममें तुममें करार था तुम्हें याद हो कि न याद हो ।
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो ।

वो नए गिले वो शिकायतें वो मजे मजे की हिकायतें
वो हरेक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो 

कोई बात ऐसी अगर हुई जो तुम्हारे जी को बुरी लगी
तो बयान से पहले ही रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो ।

सुनो जिक्र है कई साल का कोई वादा मुझसे था आपका
वो निबाहने का जिक्र क्या तुम्हें याद हो कि न याद हो ।

कभी हममें तुममें भी चाह थी कभी हमसे तुमसे भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना तुम्हें याद हो कि न याद हो ।

जिसे आप गिनते थे आशना जिसे आप कहते थे बावफा
मैं वही हूं मोमिन-ए-मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो ।

Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!