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मिर्ज़ा ग़ालिब

काव्य चर्चा

ग़ालिब ने बनारस को मोहब्बत से कहा 'चिराग़-ए-दैर'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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उर्दू और फ़ारसी ज़ुबान के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की पुण्यतिथी पर अमर उजाला काव्य का ग़ालिब की बनारस शहर से मोहब्बत और उस मोहब्बत को दिए गए उनके अल्फ़ाज़ों से वाक़िफ़ कराने का एक प्रयास है।
ग़ालिब ने बनारस पहुंचने के बाद अपने एक अज़ीज़ दोस्त को ख़त में कहा कि,

लोग  कहते  हैं  वो जा  पहुंचा  बनारस ज़िंदा
हमको उस घास के तिनके से यह उम्मीद न थी

ग़ालिब ने यह लिखा क्योंकी बनारस पहुंचने से पहले ग़ालिब लंबे समय तक बीमार रहे थे। इसलिए उन्हे लगभग पांच महीने लखनऊ में और छह महीने बांदा में ठहरना पड़ा था। अपनी कश्ती पर सवार होकर ग़ालिब गंगा के रास्ते जब बनारस पहुंचे तो वहां पहुंच कर उनकी तबीयत बहाल हो गई। वहां के प्राकृतिक दृश्य, नदी, मंदिर, उद्यान, शहर और शहर के निवासियों ने ग़ालिब को ख़ूब लुभाया। बनारस में तीन हफ़्ते रहने और शहर को जानने के बाद ग़लिब ने अपने दोस्तों को ख़त लिखकर बनारस शहर की ख़ूब प्रशंसा की। ख़तों में बनारस की इतनी प्रशंसा करने के बाद उन्होंनें बारह शेर लिखे। आगे पढ़ें

वाह-वाह ! बनारस के क्या कहने

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