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makhan lal chaturvedi poem pushp ki abhilasha

काव्य चर्चा

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक… माखनलाल चतुर्वेदी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,

चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक

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