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'पतंग' पर कहे गये शेर...

काव्य चर्चा

'पतंग' पर कहे गये शेर...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ में 
चाहा इधर घटा दिया चाहा उधर बढ़ा दिया 
~नज़ीर अकबराबादी

तिलिस्म-ए-होश-रुबा में पतंग उड़ती है 
किसी अक़ब की हवा में पतंग उड़ती है 
~ज़फ़र इक़बाल आगे पढ़ें

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