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mahadevi verma sanchayita kavitayein

काव्य चर्चा

यह घटा घिरती रही पर भूमि पर बरसी नहीं - महादेवी वर्मा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

महादेवी के पास राग की कमी नहीं है। इसका प्रमाण है सौंदर्य और ऐश्वर्य से भरपूर उनके प्रकृति-चित्र। छायावादी कवियों के प्रकृति-चित्र कुछ समानताओं के रहते भी अपनी कल्पना और शैली में एक-दूसरे से कितने भिन्न हैं इसे वसंत-रजनी पर रचित महादेवी की इस प्रसिद्ध कविता में लक्ष्य किया जा सकता है।

धीरे-धीरे उतर क्षितिज से 
आ वसंत-रजनी
तारकमय नव वेणी बंधन,
शीश-फूल कर शशि का नूतन
रश्मि-वलय सित घन-अवगुण्ठन,
मुक्ताहल अभिराम बिछा दे
चितवन से अपनी 
पुलकती आ वसंत-रजनी

महादेवी की कल्पना में एक सम्मोहन नारी चित्र स्थिर है। वे वसंत रजनी का इसी रूप में आह्वान करती हैं। ऐसी कविताओं का आकर्षण है चित्रकला के उपकरणों का काव्यात्मक उपयोग। जाने माने आत्मीय शब्दों को संगीत और व्यंजना का नया सौंदर्य प्रदान करने की उनकी सामर्थ्य। 

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