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'डर' या 'ख़ौफ़' पर चुनिंदा शेर

काव्य चर्चा

'डर' या 'ख़ौफ़' पर चुनिंदा शेर...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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डर कई बार आदमी को नियंत्रित बनाता है, कई बार कायर भी। डर या ख़ौफ़ निहायत ही इंसानी फितरत है, इंसानी ही क्यों कहें यह तो जानवरों में भी पाया जाता है। डर एक चीज है लेकिन डर कायम करना दूसरी चीज है। शायरी इसे अपने नज़रिए से देखती  है। 

आग कितनी ही ख़ौफ़नाक सही
उस की लपटों की उम्र थोड़ी है
- वसीम बरेलवी

लहर दहलीज़ पर आई है जब से
समुंदर ख़ौफ़ खाने लग गया है
- पूनम यादव

इक ख़ौफ़ सा दरख़्तों पे तारी था रात-भर 
पत्ते लरज़ रहे थे हवा के बग़ैर भी 
- फ़ुज़ैल जाफ़री आगे पढ़ें

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