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इरशाद

जिगर मुरादाबादी की ग़ज़ल: निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा 
तो बस हाथ मलते ही रह जाइएगा 

निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा 
जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा 

मिरा जब बुरा हाल सुन पाइएगा 
ख़िरामाँ ख़िरामाँ चले आइएगा  आगे पढ़ें

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