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जावेद अख़्तर की 3 चुनिंदा ग़ज़लें

काव्य चर्चा

जावेद अख़्तर की 3 चुनिंदा ग़ज़लें

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जावेद अख़्तर (17 जनवरी 1945-) शायर, फिल्मों के गीतकार और पटकथा लेखक हैं। उनका जन्म ग्वालियर में हुआ था। उनके वालिद जां निसार अख़्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि और वालिदा सफ़िया अख़्तर क़स्बा रुदौली, जिला बाराबंकी की एक उच्च शिक्षा प्राप्त महिला थीं। वह प्रगतिशील आंदोलन के एक और सितारे लोकप्रिय शायर मजाज़ के भांजे भी हैं। अपने दौर के प्रसिद्ध शायर मुज़्तर ख़ैराबादी जावेद जी के दादा थे। जावेद के काव्य संग्रह हैं : तरकश और लावा । उर्दू शायरी के गुलशन में रंग-रंग के जो फूल खिले हैं उसमें एक रंग जावेद अख़्तर का भी है। 'तरकश' और 'लावा' उनके काव्य संग्रह हैं।
प्रस्तुत है जावेद अख़्तर की 3 चुनिंदा ग़ज़लें- 

ब-ज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है 
मगर ये तो मिरी मंज़िल नहीं है 

ये तूदा रेत का है बीच दरिया 
ये बह जाएगा ये साहिल नहीं है 

बहुत आसान है पहचान उस की 
अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है 

मुसाफ़िर वो अजब है कारवाँ में 
कि जो हमराह है शामिल नहीं है 

बस इक मक़्तूल ही मक़्तूल कब है 
बस इक क़ातिल ही तो क़ातिल नहीं है 

कभी तो रात को तुम रात कह दो 
ये काम इतना भी अब मुश्किल नहीं है  आगे पढ़ें

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