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इब्ने इंशा

काव्य चर्चा

इब्ने इंशा : मनुष्य की स्वाधीनता और स्वाभिमान का शायर

रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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सब माया है
सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है 

वो लड़की थी जो चाँद नगर की रानी थी
वो जिसके अल्हड़ आँखों में हैरानी थी
आज उसने भी पैगाम यही भिजवाया है 
सब माया है... सब माया है 

जो लोग अभी तक नाम वफ़ा का लेते हैं 
वो जान के धोके खाते, धोके देते हैं 
हाँ ठोक-बजा कर हम ने हुक्म लगाया है 
सब माया है 


ये नज़्म है इब्ने इंशा की, इसे गाया है अताउल्ला खां साहब ने। 'इंशा' ने शायरी के प्रचलित तौर-तरीकों से अलग अपनी रचनाओं के लिए एक नया सौंदर्य-बोध ईजाद किया। 

सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है जैसा फ़कीरी अंदाज 'इंशा' के यहां ही संभव है। हिंदी साहित्य में जो धारा कबीर या नागार्जुन की थी उर्दू में वही धारा इब्ने इंशा की रही।

इसीलिए उनकी कविताओं-नज़्मों में मिट्टी की वो खुशबू आती है जो अमूमन पहली बारिश के बाद उठती है। उनके कलाम में स्वयं को तलाश सकते हैं। दुनिया के विविध रंगों को वे अपनी कविताओं में बड़े बारीकी से ढाल लेते हैं।  आगे पढ़ें

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