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आम आदमी की आवाजें बुलंद करतीं हबीब जालिब की नज़्में- भए कबीर उदास

काव्य चर्चा

आम आदमी की आवाजें बुलंद करतीं हबीब जालिब की नज़्में- भए कबीर उदास

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अन्याय और अनाचार के विरुद्ध किसी भी सत्ता के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के मामले में हबीब जालिब की नज़्में अपनी प्रतिबद्धता और आमजन से आबद्धता को नहीं भूलती।

इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोए
दूजा जुल्फ़ों की छाओं में सुख की सेज पे सोए
राज सिंहासन पर इक बैठा और इक उसका दास
भए कबीर उदास

ऊँचे ऊँचे ऐवानों में मूरख हुकम चलाएं
क़दम क़दम पर इस नगरी में पंडित धक्के खाएं
धरती पर भगवान बने हैं धन है जिनके पास
भए कबीर उदास
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