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दिवंगत कवि और लेखक गंगा प्रसाद विमल की चुनिंदा कविताएं...

दिवंगत कवि और लेखक गंगा प्रसाद विमल की 3 चुनिंदा कविताएं...
                
                                                                                 
                            बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में युवा कविता का जो स्वर उभरा था उसने कविता की दुनिया में देशव्यापी हलचल मचाई थी। आधी शताब्दी के स्थापत्य के प्रति विश्वव्यापी असहमति युवा स्वरों में उभरनी प्रारंभ हुई थी जिसके व्यापक अर्थ दुनियाभर में सृजनात्मक कोशिशों के रूप में प्रतिबिंबित हुए थे। उन्हीं कोशिशों में एक हिस्सा हिंदी का भी था और गंगा प्रसाद विमल एक सृजनशील कवि की तरह अपनी भूमिका निभाते रहे। हिंदी साहित्य जगत के लिए बहुत दुखद क्षण है कि आज विमल जी हमारे बीच नहीं रहे, उनकी स्मृतियां हमेशा हमारे साथ रहेंगी। प्रस्तुत है गंगा प्रसाद विमल की 3 चुनिंदा रचनाएं- 
                                                                                                



पहले मैं जिस्म में 
कैद हूं 

जिस्म 
गुरुत्वाकर्षण में

गुरुत्वाकर्षण कैद है
सौरमण्डल के क्रम में 

सौरमण्डल 
आकाशगंगा में 

अकाशगंगा 
अंतरिक्ष में 

बाहर से मैं 
गुलाम हूं 
इन्द्रियों का

इन्द्रियां वासना की 
वासनाएं अर्थ की 

अर्थ व्यवस्था की 
व्यवस्थाएं विचार की दास 

और विचार ही हैं 
जो मुझे 
मुक्ति के लिए 
प्रेरित करते हैं 

और विचार 
खुद बंदी हैं
मस्तिष्क में 

कहते हैं 
मस्तिष्क आत्मा का गुलाम है 

आत्मा मैंने कहां देखी है ? आगे पढ़ें

मैं उसे देखता हूं...

2 years ago

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