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दुनियादारी

काव्य चर्चा

'दुनियादारी' पर चुनिंदा शेर...

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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कविता, शायरी, ग़ज़ल या गीत किसी हदबंदी में बंधे नहीं होते। आम आदमी के एहसासों को ही कोई शायर अपनी शायरी और ग़ज़लों में ढालता है। आपस की दूरियों को पाटने, दीवारों को गिराने का काम कविता ही करती है। एक मुकम्मल इंसान को रचने-गढ़ने के लिए शायरों के अल्फ़ाज भी काफी हद तक अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। शायरों ने दुनियादारी के लगभग हर विषयों को अपनी रचनाओं में ढाला है । पेश है दुनियादारी पर कुछ शेर...

1-मैं परबतों से लड़ता रहा और चंद लोग
गीली ज़मीन खोद के फ़रहाद हो गये 
-'राहत' इंदौरी 

2-सितमगीरी की तालीमें उन्हें दी हैं यह कह-कहकर,
कि रोते जिस किसी को देख लेना मुस्कुरा देना 
-अज्ञात 
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उनके देखे से जो आ जाती है...

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