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केदारनाथ सिंह

काव्य चर्चा

कवि केदारनाथ सिंह : कथाओं से भरे इस देश में मैं भी एक कथा हूँ

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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वो मिट्टी के दिन, वो घरौंदों की शाम,
वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम,
मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम,
वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम
वो दिन भर का पढ़ना, वो भूलों की शाम,
वो वन-वन के बाँसों-बबूलों की शाम,
झिड़कियाँ पिता की, वो डाँटों की शाम,
वो बंसी, वो डोंगी, वो घाटों की शाम,
वो बाँहों में नील आसमानों की शाम,
वो वक्ष तोड़-तोड़ उठे गानों की शाम,
वो लुकना, वो छिपना, वो चोरी की शाम,
वो ढेरों दुआएँ, वो लोरी की शाम,
वो बरगद पे बादल की पाँतों की शाम
वो चौखट, वो चूल्हे से बातों की शाम,
वो पहलू में किस्सों की थापों की शाम,
वो सपनों के घोड़े, वो टापों की शाम,

वो नए-नए सपनों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।


समकालीन हिंदी कविता के क्षेत्र में केदारनाथ सिंह उन गिने-चुने कवियों में से हैं जिनमें 'नयी कविता' उत्कर्ष पर पहुँचती है। गाँव और शहर, लोक और आधुनिकता, चुप्पी और भाषा एवं प्रकृति और स्कृति सभी पर संवाद चलता रहता है। 

मैं जा रही हूँ– उसने कहा,
जाओ– मैंने उत्तर दिया, 
यह जानते हुए कि जाना,
हिंदी की सबसे खौफ़नाक क्रिया है।


केदार नाथ सिंह आज की युवा पीढ़ी पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। अपनी पूरी रचनात्मकता के साथ एक गहरा प्रतिरोध का स्वर भी उनकी कविता में किसी न किसी रूप में मौजूद रहता है। 'बाघ' कविता संग्रह पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय रही है। ‘बाघ’ कविता के हर टुकड़े में बाघ चाहे एक अलग इकाई के रूप में दिखाई पड़ता हो, पर आख़िरकार सारे चित्र एक दीर्घ सामूहिक ध्वनि-रूपक में समाहित हो जाते हैं। कविता इतने बड़े फलक पर आकार लेती है कि उसमें जीवन की चुप्पियाँ और आवाजें साफ-साफ़ सुनाई देंगी। 

आज सुबह के अख़बार में 
एक छोटी-सी ख़बर थी
कि पिछली रात शहर में 
आया था बाघ !
किसी ने उसे देखा नहीं
अँधेरे में सुनी नहीं किसी ने 
उसके चलने की आवाज़
गिरी नहीं थी किसी भी सड़क पर 
ख़ून की छोटी-सी एक बूँद भी
पर सबको विश्वास है
कि सुबह के अख़बार मनें छपी हुई ख़बर 
ग़लत नहीं हो सकती
कि ज़रूर-ज़रूर पिछली रात शहर में 
आया था बाघ 


'बाघ' कविता संग्रह के विषय में वे लिखते हैं, ''आज का मनुष्य बाघ की प्रत्यक्ष वास्तविकता से इतनी दूर आ गया है कि जाने-अनजाने बाघ उसके लिए एक मिथकीय सत्ता में बदल गया है। पर इस मिथकीय सत्ता के बाहर बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने के साथ हमारे अपने होने का भविष्य जुड़ा हुआ है। इस प्राकृतिक 'बाघ' के साथ उसकी सारी दुर्लबता के बावजूद-मनुष्य का एक ज़्यादा गहरा रिश्ता है, जो अपने भौतिक रूप में जितना पुराना है, मिथकीय रूप में उतना ही समकालीन।'' उनकी कविताओं में 'बाघ' कई रूपों में पाठकों के सामने आता है। 

कथाओं से भरे इस देश में
मैं भी एक कथा हूँ
एक कथा है बाघ भी
इसलिए कई बार 
जब उसे छिपने को नहीं मिलती
कोई ठीक-ठाक जगह
तो वह धीरे से उठता है
और जाकर बैठ जाता है
किसी कथा की ओट में। 


20 नवम्बर 1934 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव में जन्में केदारनाथ सिंह की 'ज़मीन पक रही है', 'उत्तर कबीर' और 'अन्य कविताएँ', 'तालस्ताय' और 'साइकिल संग्रह', जैसे कई संग्रह हैं। उन्हें कविता संग्रह "अकाल में सारस" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (1989), मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती सम्मान (उड़ीसा) और व्यास सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें साहित्य के प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ सम्मान 2013 के लिए चुना गया। वे हिंदी के 10 वें रचनाकार हैं, जिन्हें यह पुरस्कार दिया गया है। केदारनाथ सिंह के 'अभी बिल्कुल अभी', 'यहां से देखो', 'अकाल में सारस', 'बाघ' जैसे कविता संग्रह बहुत प्रसिद्ध रहे हैं। 

भर लो
दूध की धार की
धीमी-धीमी चोटें
दिये की लौ की पहली कँपकँपी
आत्मा में भर लो

भर लो
एक झुकी हुई बूढ़ी
निग़ाह के सामने
मानस की पहली चौपाई का खुलना
और अन्तिम दोहे का
सुलगना भर लो

भर लो
ताकती हुई आँखों का
अथाह सन्नाटा
सिवानों पर स्यारों के
फेंकरने की आवाज़ें
बिच्छुओं के
उठे हुए डंकों की
सारी बेचैनी
आत्मा में भर लो

और कवि जी सुनो
इससे पहले कि भूख का हाँका पड़े
और अँधेरा तुम्हें चींथ डाले

भर लो
इस पूरे ब्रह्माण्ड को
एक छोटी-सी साँस की
डिबिया में भर लो 
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