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तमाम उम्र ग़ज़ल की नाज़ुक मिज़ाजी से मुतासिर रहने वाला शायर

काव्य चर्चा

तमाम उम्र ग़ज़ल की नाज़ुक मिज़ाजी से मुतासिर रहने वाला शायर

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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वैसे फ़राज़ साहब का ख़ानदानी ताल्लुक सूफी परंपरा से जुड़ता है और वह कोहाट के मशहूर संत हाजी बहादुर के वंशज है और उनका नाम भी है उसी तर्ज पर सैयद अहमद शाह लेकिन अपनी शायरी में ये किसी अबूझ ईश्वर की बात नहीं करते न ही किसी मजाज़ी इश्क के चक्कर में पड़ते हैं बल्कि उनका इश्क़ विशुद्ध हक़ीक़ी है। तरक्की पसंद शायरी के दौर में जिस एक शायर ने मूल लहजे को बजिद नहीं छोड़ा और तमाम उम्र ग़ज़ल की नाज़ुक मिज़ाजी से मुतासिर रहे अहमद फ़राज़ शायरी में उसी शख़्सियत का नाम है। फ़ैज़ के गम-ए- दौरां अपने गम-ए-जानां की एक अलहद और पुरकशिश दुनियां बनाकर फ़राज़ ने उर्दू शायरी को एक बहुत नर्म और नाज़ुक अहसास अता की और ग़ज़ल जिसका मतलब ही माशूका से गुफ़्तगू करना होता है उसे नए अंदाज़ दिए। पेश है अहमद फ़राज़ के चुनिंदा शेर...

दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है 
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता 

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़' 
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला 
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