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Dushyant kumar love poems

काव्य चर्चा

एक जंगल है तेरी आंखों में...मैं जहां राह भूल जाता हूं...ऐसा है दुष्यंत कुमार का 'इश्क'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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"दुष्यंत कुमार अपने जमाने के नए युवकों की आवाज़ हैं", ऐसा कहना था निदा फ़ाज़ली का। दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से क्रान्ति ला दी थी, उनकी रचनाएं वो संचार थीं जिन्होंने समाज के पिछड़े वर्गों को जागरुक किया। उन्होंने 'एक कंठ विषपायी' (काव्य नाटक), 'और मसीहा मर गया' (नाटक) एवं 'सूर्य का स्वागत' जैसी कालजयी कृतियों की रचना की है। साहित्य के संसार में दुष्यंत कुमार का स्थान अद्वितीय है, उनकी ग़ज़ल कहां तो तय था चरागां हर घर के लिए को लोग ने कंठस्थ कर लिया है। इसी के साथ उनकी प्रेम-रस की कविताएं भी किसी से कम नहीं है। 

पेश हैं उनकी लिखी कुछ ऐसी ही रचनाएं...
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अब उम्र की ढलान उतरते हुए मुझे...

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