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Bulleshah holi khelungi keh kar bismillah

काव्य चर्चा

गंगा-जमुनी तहज़ीब यही तो है कि 'होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह'

दीपाली अग्रवाल काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मानव जाति के सबसे बड़े दुर्भाग्यों में से एक ये है कि उसे मज़हब के आधार पर बंटना पड़ा। ये बंटवारा सिर्फ़ ईश्वरीय सत्ता तक ही सीमित नहीं है। जब लोग बंटे तो उनके खाने से लेकर कपड़े तक धर्मों के साथ तक़सीम हो गए और यहां से नफ़रतों के वह बीज पड़े जिसमें स्वार्थ के हिसाब से लोगों ने ख़ूब पानी डाला और उसे सींचा।

लेकिन संस्कृति और उत्सव-धर्मिता ने भाईचारे को सदैव ज़िंदा रखा। ईद की सेवईयां जब बंटीं तो पूरे मुहल्ले में बंटी, वहीं दीवाली के दीपक जले तो आस-पास का भी हर घर रौशन हुआ। इसी को महसूस करते हुए अदब ने हमेशा से मज़हबों की एकता की ही बात की है। इसका सबसे सुंदर उदाहरण बुल्लेशाह की रचना है जो उन्होंने होली पर लिखी है। यह रचना अपने आप में एक ख़ास महत्व रखती है उस संस्कृति के लिए जो समरसता की बात करती है। इतिहास बताता है कि मुग़लों के समय से ही होली को शाही तौर पर पूरे राज्य में मनाया जाता था। इससे महसूस होता है कि त्यौहारों ने मानव सभ्यता को किस तरह जोड़कर रखा और किस तरह साथ मिलकर पर्वों का आनंद लिया जाता था। तभी तो बुल्लेशाह कहते हैं कि

होरी खेलूंगी कह कर बिस्मिल्लाह

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