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brij bhasha special kavi krishnadas poetry

काव्य चर्चा

ब्रजभाषा विशेष: कवि कृष्ण दास की रचनाओं का माधुर्य

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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विभिन्न बोलियों का उत्सव मनाते हुए हम अपने पाठकों के लिए लेकर आए हैं भोजपुरी विशेष और ब्रजभाषा विशेष काव्य जिसमें हम उक्त बोलियों में रचित रचनाओं को अपने पाठकों के सामने रखते हैं। इसी सीरीज़ को आगे बढ़ते हुए पेश हैं आपके लिए ब्रजभाषा में लिखे कृष्ण दास के पद

देख जिऊँ माई नयन रँगीलो
लै चल सखी री तेरे पायन लागौं, गोबर्धन धर छैल छबीलो
नव रंग नवल, नवल गुण नागर, नवल रूप नव भाँत नवीलो
रस में रसिक रसिकनी भौहँन, रसमय बचन रसाल रसीलो
सुंदर सुभग सुभगता सीमा, सुभ सुदेस सौभाग्य सुसीलो
'कृष्णदास प्रभु रसिक मुकुट मणि, सुभग चरित रिपुदमन हठीलो


(कवि कृष्ण दास का कहना है कि वह रंगीले नयनों वाले को देखकर ही दी रहे हैं। वह कहते हैं कि वह पैर पढ़ते हैं कि उन्हें गोवर्धन ले जाया जाए, आगे वह कृष्ण के रूप-स्वरुप का वर्णन करते हैं)

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गोकुल गाम सुहावनो सब मिलि खेलें फाग

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