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एकता' और 'भाईचारे' जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर शेर...

काव्य चर्चा

एकता' और 'भाईचारे' जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर शेर...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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'एकता' और 'भाईचारा' किसी प्रगतिशील समाज की मूलभूत ज़रूरत है। लेकिन सामाज विभिन्न जातियों और समुदायों में बंटा हुआ है, कई बार ये वजहें कड़ुवाहट पैदा करती हैं। ऐसी स्थितियों में ही सजग रहने की ज़रूरत होती है। शायरों ने 'एकता' और 'भाईचारा' जैसे बुनियादी इंसानी जज़्बातों को ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ों से नवाजा है

मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं
मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी
- क़ैशर शमीम

मोहब्बत से हम अपनी चाहतें पुरनूर करते हैं
गले मिलकर हर एक शिकवे गिले हम दूर करते हैं
-अज्ञात आगे पढ़ें

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