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फ़राज़ की शायरी में इश्क़ का बेलौस अंदाज़ तो बेवफाई की अलहदा रूमानियत भी है

काव्य चर्चा

फ़राज़ की शायरी में इश्क़ का बेलौस अंदाज़ तो बेवफाई की अलहदा रूमानियत भी है...

राकेश मिश्र, वर्धा

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तरक्की पसंद शायरी के दौर में जिस एक शायर ने मूल लहजे को बजिद नहीं छोड़ा और तमाम उम्र ग़ज़ल की नाज़ुक मिज़ाजी से मुतासिर रहे अहमद फ़राज़ शायरी में उसी शख़्सियत का नाम है। फ़ैज़ के गम-ए- दौरां अपने गम-ए-जानां की एक अलहद और पुरकशिश दुनिया बनाकर फ़राज़ ने उर्दू शायरी को एक बहुत नर्म और नाज़ुक अहसास अता की और ग़ज़ल जिसका मतलब ही माशूका से गुफ़्तगू करना होता है उसे नए अंदाज़ दिए। मशहूर हो चुकी उनकी ग़ज़ल के इन शेरों से आप वाकिफ़ ही होंगे - 

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ 
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ 

कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख 
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ 

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो 
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ 

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम 
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ 
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