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Aalok promoting Indian culture in your poetry

काव्य चर्चा

दुनिया में फैलता हिंदुस्तानी तहजीब का ‘आलोक’

अभिनव चौहान, काव्य डेस्क

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बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपनी शख्सियत से कहीं ज्यादा अपनी सादा मिजाजी के लिए जाने जाते हैं। मेरे इर्द-गिर्द के उन लोगों का नाम लूं तो हिंदी गजलकार आलोक श्रीवास्तव का नाम जरूर आएगा। एक ऐसा शख्स जिसके मिलने में कोई तकल्लुफ नहीं है, जिसके मिजाज और मुलाकात में सादापन है। 

आलोक भाई से मेरा परिचय तब से है जब देश के नामचीन शायर भी उनके शेरों के मिसरे को अपना बनाकर सामइनों को चिपका रहे थे। लेकिन उनसे पहली मुलाकात 2014 में हुई। गजरौला में कवि सम्मेलन मुशायरे का आयोजन कराया था। उससे पहले उनसे संपर्क किया।

जिगर की जमीन से आने की वजह से शायरी की लत बहुत बुरी लगी है। खून में अल्फाज और दिल में इश्क लेकर खुदा में उतारा था। जिगर के शहर को शर्मिंदा करता भी तो कैसे, लिहाजा अपने बड़ों से सीखकर कागज और कलम के साथ कारसतानियां शुरू कर दीं। इन्हीं हरकतों की वजह से कुछ बड़े नामों का हमेशा आशीर्वाद रहा। आलोक भाई को दावत दी और उन्होंने बिना तकल्लुफ हां भी कर दी।

इत्तेफाक ये हुआ कि मुशायरे की तारीख वाले दिन ही उनके शहर विदिशा में उनकी कुल देवी की पूजा थी। आलोक भाई ने ना आने की मजबूरी जाहिर की, क्योंकि मां का आदेश था। लेकिन ये शख्स हाल ही में बरामद पाए गए इस छोटे भाई की गुजारिश को ठुकरा न सका। आनन-फानन में मैंने भोपाल से मुम्बई और मुम्बई से दिल्ली की सबसे पहली हवाई उडान का टिकट कराया। 

अब सारी बातें पीछे छूट चुकी थीं। आयोजक और शायर का रिश्ता कमजोर पड़ चुका था। यहां से कुछ एहसास वाला रिश्ता शुरू हुआ। बहरहाल दिन आया मुशायरे का और आधी रात को गजल का ‘आलोक’ भी आया। उस दिन का दिन है अब उनके साथ एक अलग रिश्ता है।

यहां ये लिखने की जरूरत इसलिए हुई कि मेरे अलावा ऐसे कई लोग हैं जिनके साथ आलोक जी के ऐसे ही बेतकल्लुफ रिश्ते हैं। शायद ये इसलिए भी हैं क्योंकि उन्होंने अपने परिवार में रिश्तों को बहुत करीब से जिया हैं, नहीं तो यूं ही न लिख देते -

घर में झीने रिश्ते मैंने, लाखों बार उधड़ते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा।


आलोक हिंदी गजल में दुष्यंत की परंपरा में आने वाले शायर हैं। ये सनद मैं नहीं कर रहा हूं, बल्कि प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह खुद कह चुके हैं। वो ‘आमीन’ में लिखते हैं ‘‘उर्दू का जो पूरा मिजाज है, जो ‘विट’ है वह आलोक की शायरी में नजर आता है और जो बात करने या कहने का अंदाज है, उसमें यह शायरी है। दुष्यंत के बात ‘आमीन’ के आलोक ने अपनी तरह से नया प्रवाह दे दिया है।’’

गुलजार ने कहा ‘‘आलोक एक रौशनख्याल शख्स हैं, जिसके अंदर शायरी हर वक्त जगमगाती रहती है। उसकी एनर्जी और इश्तियाक देखकर अक्सर हैरत होती है। आलोक एक रोशन उफक पर खड़ा हैं नए उफक खोलने के लिए आमीन।’’ कुछ तो वजह रही होगी जो गजल सम्राट जगजीत सिंह ने एक ही वाक्य में सारा सच बयान कर दिया ‘‘आलोक की शायरी की सबसे बड़ी खूबी है - हमारा कल्चर, जब हमारा कल्चर जिंदा रहेगा, तभी हम जिंदा रहेंगे।

हिंदी पट्टी का शायद ही कोई शहर हो जहां आलोक ना गुनगुनाए जा रहे हों। तमाम बड़े गीतकारों की आवाज से उनकी गजलें और नज्म सज चुकी हैं। दुनिया भर में आज उनका नाम लिया जा रहा है। ये हिंदुस्तान के लिए गर्व की बात है। वो जिस जमीन से आते हैं वो भारत को प्राचीन काल से ही संस्कृति का बोध कराती रही हैं, लेकिन मुरादाबाद से उनका एक खास रिश्ता है।

नहीं, नहीं... ये रिश्ता मेरी वजह से नहीं, बल्कि जनाब मंसूर उस्मानी जी की वजह से हैं। दुनिया में मशहूर नाजिमों में जब नाम लिया जाता है तो आज के दौर में दो ही नाम सामने आते हैं - अनवर जलालपुरी और मंसूर उस्मानी। मंसूर साहब के वे काफी लाड़ले और पसंदीदा शायर हैं, दूर रहते हैं इसलिए प्यार भी ज्यादा मिलता है। इत्तेफाक ये है कि छोटा होने के कारण लाड़ला तो मैं भी हूं, लेकिन शहर में ही रहने के कारण प्यार जरा कम मिल पाता है, लेकिन आशीर्वाद आलोक भाई से कहीं ज्यादा चुरा लेता हूं।

मंसूर जी ने ही एक बार बातचीत में कहा था कि आलोक आज के दौर के सबसे ठहरे और गहरे शायरों में हैं। आलोक जी की शख्सियत को बयान करने में बहुत उलझन नहीं होगी क्योंकि वह सादा मिजाज हैं। जो उनसे रिश्ता है वो ताउम्र बरकरार रहे। इस बात पर हिंदुस्तान गर्व कर सकता है कि दुनिया में हिंदुस्तानी तहजीब का ‘आलोक’ तेजी से फैल रहा हैं, और यूं ही बना रहे इसके लिए ..... आमीन।
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