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aaj ka shabd pragaad

काव्य चर्चा

आज का शब्द - प्रगाढ़ और चंद्रकांत देवताले की कविता

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है - प्रगाढ़ जिसका अर्थ है गहरा या बहुत अधिक। कवि चंद्रकांत देवताले इसे अपनी कविता में यूं प्रयोग करते हैं। 

मेरे होने के प्रगाढ़ अंधेरे को
पता नहीं कैसे जगमगा देती हो तुम
अपने देखने भर के करिश्मे से

कुछ तो है तुम्हारे भीतर
जिससे अपने बियाबान सन्नाटे को
तुम सितार सा बजा लेती हो समुद्र की छाती में

अपने असंभव आकाश में
तुम आजाद चिड़िया की तरह खेल रही हो
उसकी आवाज की परछाई के साथ
जो लगभग गूंगा है
और मैं कविता के बन्दरगाह पर खड़ा
आंखे खोल रहा हूं गहरी धुंध में

लगता है काल्पनिक खुशी का भी
अन्त हो चुका है
पता नहीं कहां किस चट्टान पर बैठी
तुम फूलों को नोंच रही हो
मैं यहां दुःख की सूखी आंखों पर
पानी के छींटे मार रहा हूं
हमारे बीच तितलियों का अभेद्य परदा है शायद

जो भी हो
मैं आता रहूंगा उजली रातों में
चन्द्रमा को गिटार सा बजाऊंगा
तुम्हारे लिए
और वसन्त के पूरे समय
वसन्त को रूई की तरह धुनकता रहूंगा
तुम्हारे लिए


अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है।

इस अभियान के अंतर्गत हम प्रतिदिन हिंदी के मूर्धन्य कवियों से आपका परिचय करवाते हैं। चूंकि साहित्य किसी भी भाषा का सबसे सटीक दस्तावेज है जो सदियों को अपने भीतर समेटे हुए है इसलिए यह परिचय न सिर्फ़ एक कवि बल्कि भाषा की निकटता को भी सुनिश्चित करेगा, ऐसा विश्वास है।

इसके साथ ही अपनी भाषा के शब्दकोश को विस्तार देना स्वयं को समृद्ध करने जैसा है। इसके अंतर्गत आप हमारे द्वारा जानते हैं - आज का शब्द। हिंदी भाषा के एक शब्द से प्रतिदिन आपका परिचय और कवियों ने किस प्रकार उस शब्द का प्रयोग किया है, यह इसमें सम्मिलित है।

आप हमारे साथ इस मुहिम का हिस्सा बनें और भाषा की गरिमा का अनुभव करें।
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