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aaj ka shabd prabhaat

काव्य चर्चा

आज का शब्द - प्रभात और अयोध्या सिंह उपाध्याय की कविता सरिता

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- ' प्रभात' जिसका अर्थ है प्रात: काल या सुबह। कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ इसे अपनी कविता 'सरिता' में यूं प्रयोग करते हैं।

किसे खोजने निकल पड़ी हो
जाती हो तुम कहां चली
ढली रंगतों में हो किसकी
तुम्हें छल गया कौन छली

क्यों दिन–रात अधीर बनी–सी
पड़ी धरा पर रहती हो।
दु:सह आतप शीत–वात सब
दिनों किस लिये सहती हो

कभी फैलने लगती हो क्यों
कृश तन कभी दिखाती हो
अंग–भंग कर–कर क्यों आपे
से बाहर हो जाती हो

कौन भीतरी पीड़ाएं
लहरें बन ऊपर आती हैं
क्यों टकराती ही फिरती हैं
क्यों कांपती दिखाती है

बहुत दूर जाना है तुमको
पड़े राह में रोड़े हैं
हैं सामने खाइयां गहरी
नहीं बखेड़े थोड़े हैं

पर तुमको अपनी ही धुन है
नहीं किसी की सुनती हो
कांटों में भी सदा फूल तुम
अपने मन के चुनती हो

उषा का अवलोक वदन
किस लिये लाल हो जाती हो
क्यों टुकड़े–टुकड़े दिनकर की
किरणों को कर पाती हो

क्यों प्रभात की प्रभा देखकर
उर में उठती है ज्वाला
क्यों समीर के लगे तुम्हारे
तन पर पड़ता है छाला

अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है।

इस अभियान के अंतर्गत हम प्रतिदिन हिंदी के मूर्धन्य कवियों से आपका परिचय करवाते हैं। चूंकि साहित्य किसी भी भाषा का सबसे सटीक दस्तावेज है जो सदियों को अपने भीतर समेटे हुए है इसलिए यह परिचय न सिर्फ़ एक कवि बल्कि भाषा की निकटता को भी सुनिश्चित करेगा, ऐसा विश्वास है।

इसके साथ ही अपनी भाषा के शब्दकोश को विस्तार देना स्वयं को समृद्ध करने जैसा है। इसके अंतर्गत आप हमारे द्वारा जानते हैं - आज का शब्द। हिंदी भाषा के एक शब्द से प्रतिदिन आपका परिचय और कवियों ने किस प्रकार उस शब्द का प्रयोग किया है, यह इसमें सम्मिलित है।

आप हमारे साथ इस मुहिम का हिस्सा बनें और भाषा की गरिमा का अनुभव करें।
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