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aaj ka shabd paavas

काव्य चर्चा

आज का शब्द - पावस और माखनलाल चतुर्वेदी की कविता

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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भाषा हमारे विचारों को शब्द देती है, मूक को वाणी देती है। ऐसी ही भाषा हिंदी के लिए है अमर उजाला की श्रृंखला 'हिंदी हैं हम' जिसके अंतर्गत आप जानते हैं प्रतिदिन एक शब्द, उसका अर्थ और उससे जुड़ी कविता। इसी श्रृंखला में आज का शब्द है 'पावस' जिसका अर्थ है- बारिश या बरसात। कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने इसका प्रयोग अपनी कविता में यूं किया है। 

वर्षा ने आज विदाई ली जाड़े ने कुछ अंगड़ाई ली
प्रकृति ने पावस बूंदों से रक्षण की नव भरपाई ली।

सूरज की किरणों के पथ से काले काले आवरण हटे
डूबे टीले महकन उठ्ठी दिन की रातों के चरण हटे।

पहले उदार थी गगन वृष्टि अब तो उदार हो उठे खेत
यह उग उग आई बहार वह लहराने लग गई रेत।

ऊपर से नीचे गिरने के दिन रात गए छवियां छायीं
नीचे से ऊपर उठने की हरियाली पुन: लौट आई।

अब पुन: बांसुरी बजा उठे ब्रज के यमुना वाले कछार
धुल गए किनारे नदियों के धुल गए गगन में घन अपार।

अब सहज हो गए गति के वृत जाना नदियों के आर पार
अब खेतों के घर अन्नों की बंदनवारें हैं द्वार द्वार।

नालों नदियों सागरो सरों ने नभ से नीलांबर पाए
खेतों की मिटी कालिमा उठ वे हरे हरे सब हो आए।

मलयानिल खेल रही छवि से पंखिनियों ने कल गान किए
कलियां उठ आईं वृन्तों पर फूलों को नव मेहमान किए।

घिरने गिरने के तरल रहस्यों का सहसा अवसान हुआ
दाएं बाएं से उठी पवन उठते पौधों का मान हुआ।

आने लग गई धरा पर भी मौसमी हवा छवि प्यारी की
यादों में लौट रही निधियां मनमोहन कुंज बिहारी की।

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