आज का शब्द-कपाल और अटल बिहारी वाजपेयी की कविता: दो अनुभूतियां

आज का शब्द-कपालऔर अटल बिहारी वाजपेयी की कविता: दो अनुभूतियां।
                
                                                             
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है-कपाल, जिसका अर्थ है-  1. खोपड़ी; सिर 2. मस्तक; ललाट; माथा 3. भिक्षुओं का मिट्टी का बना भिक्षा-पात्र; खप्पर 4. वह पात्र जिसमें यज्ञ का पुरोडाश (खीर) पकाया जाता है 5. मिट्टी के घड़े का टूटा हुआ अर्धगोलाकार भाग; खपड़ा 6. एक प्रकार का कोढ़ 7. ढाल। प्रस्तुत है अटल बिहारी वाजपेयी की कविता: दो अनुभूतियां...
                                                                     
                            


पहली अनुभूति:

गीत नहीं गाता हूं

बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं 
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर आगे पढ़ें

1 year ago

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