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aaj ka shabd drig

काव्य चर्चा

आज का शब्द - दृग और कविता 'निर्गुण के दृग आज सजल क्यों'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है - दृग जिसका अर्थ है नेत्र या दृष्टि। 
प्रस्तुत है केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ की कविता 'निर्गुण के दृग आज सजल क्यों' 

निर्गुण के हिय की धड़कन में
लय बन गूंज रहा प्रतिपल क्यों

किसने सुधि का दीप जलाया
सुलग उठी निर्गुण की माया
निर्गुण की सूनी सांसों में

आज न जाने यह हलचल क्यों
निर्गुण के दृग आज सजल क्यों

निर्गुण के स्वर में क्यों अंबर
रोता है बिरही-सा झर-झर
निर्गुण के प्राणों की ‘लौ’ में
पिघल रहा है आज अनल क्यों
निर्गुण के दृग आज सजल क्यों

चिर से निर्गुण रहा अकेला
किसके आज मिलन की वेला
धरती को भर कर आंखों में

निर्गुण की कल्पना विकल क्यों
निर्गुण के दृग आज सजल क्यों
 
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