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त्रिलोक सिंह ठकुरेला के दोहे

कविता
                
                                                                                 
                            फँसी भंवर में जिंदगी, हुए ठहाके मौन
                                                                                                

दरवाजों पर बेबशी, टांग रहा है कौन

इस मायावी जगत में, सीखा उसने ज्ञान
बिना किये लटका गया, कंधे पर अहसान

महानगर या गाँव हो, एक सरीखे लोग
परम्पराएँ भूल कर, भोग रहे है भोग

किस से अपना दुःख कहें, कलियाँ लहूलुहान
माली सोया बाग़ में, अपनी चादर तान आगे पढ़ें

2 months ago

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