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 राकेशधर द्विवेदी की कविता- पीपल की छांव से

कविता
                
                                                                                 
                            मेरे घर के सामने एक
                                                                                                

पीपल का पेड़ था
जो रोज गीत नया गुनगुनाता था
कुछ नई कहानी सुनाता था
 
मां रोज जला देती थी दीया
उसे बूढ़े पीपल के पेड़ के नीचे
इस विश्वास से कि बाधाएं दूर रहेंगी
 
रोज चढ़ाती थी जल उस पेड़ पर
कि हम और हमारी संतति सुरक्षित रहेंगे
बांध देती थी कलेवे उस पेड़ के
चारों तरफ कि सर्वशक्तिमान रक्षा करेंगे हमारी
 
हल्ला मचाते थे तमाम पक्षी भी
हमें देखकर जैसे वे भी हमारी प्रार्थना
में शरीक हो रहे हैं
गिलहरी बार-बार हमें देखकर मुस्कुराती थी
फिर फुदककर पेड़ पर ऊपर चढ़ जाती थी आगे पढ़ें

1 month ago

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