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Hindi Kavita: नवीन सागर की कविता- कभी आधा कभी पूरा

कविता
                
                                                                                 
                            

छतों की दूरियाँ लाँघता मैं छतों से गिरा


खिड़कियों से झाँकता हुआ
गलियों में गिरा कभी आधा कभी पूरा!

मैं निकाला गया
जिनमें झाड़ू दी लीपा-पोता उन घरों से
धक्के देकर पार्कों रेलवे स्टेशनों से
दोस्तों के एकांत से।
जिन्हें गोद में लिए मैंने गुज़ार दी रातें
उन बच्चों के पाँव से
काँटे की तरह निकाला गया मैं।
इस उस जगह से जहाँ छूटा रह गया
हर उस जगह से जहाँ कभी था।

गिरने से बार-बार
मैं टूटा-फूटा
निकाले जाने से मैं इकदम अपने बाहर हुआ।

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1 week ago

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