आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Hindi Kavita: मंगलेश डबराल की कविता 'उन चीज़ों को छुओ जो तुम्हारे सामने मेज़ पर रखी हैं'

manglesh dabral hindi kavita un cheezon ko chhuo jo tumhare saamne mez par
                
                                                                                 
                            

 

उन चीज़ों को छुओ जो तुम्हारे सामने मेज़ पर रखी हैं
घड़ी क़लमदान एक पुरानी चिट्ठी
बुद्ध की प्रतिमा बेर्टोल्ट ब्रेश्ट और चे गेवारा की तस्वीरें
दराज़ खोलकर उसकी पुरानी उदासी को छुओ
शब्दों की अँगुलियों से एक ख़ाली काग़ज़ को छुओ
वॉन गॉग की पेंटिंग के स्थिर जल को एक कंकड़ की तरह छुओ 
जो उसमें जीवन की हलचल शुरू कर देता है
अपने माथे को छुओ 
और देर तक उसे थामे रहने में शर्म महसूस मत करो
छूने के लिए ज़रूरी नहीं कोई बिल्कुल पास में बैठा हो
बहुत दूर से भी छूना संभव है
उस चिड़िया की तरह दूर से ही जो अपने अंडों को सेती रहती है

कृपया छुएँ नहीं या छूना मना है जैसे वाक्यों पर विश्वास मत करो
यह लंबे समय से चला आ रहा एक षड्यंत्र है
तमाम धर्मगुरु ध्वजा-पताका-मुकुट-उत्तरीयधारी
बमबाज़ जंगख़ोर सबको एक दूसरे से दूर रखने के पक्ष में हैं
वे जितनी गंदगी जितना मलबा उगलते हैं
उसे छूकर ही साफ़ किया जा सकता है
इसलिए भी छुओ भले ही इससे चीज़ें उलट-पुलट हो जाएँ

इस तरह मत छुओ जैसे भगवान महंत मठाधीश भक्त चेले
एक दूसरे के सर और पैर छूते हैं
बल्कि ऐसे छुओ जैसे 
लंबी घासें चाँद-तारों को छूने-छूने को होती हैं
अपने भीतर जाओ और एक नमी को छुओ
देखो वह बची हुई है या नहीं इस निर्मम समय में।
1 month ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X