मंगलेश डबराल की कविता: प्रेम करती स्त्री

कविता
                
                                                             
                            प्रेम करती स्त्री देखती है 
                                                                     
                            
एक सपना रोज़ 
जागने पर सोचती है क्या था वह 
निकालने बैठती है अर्थ 

दिखती हैं उसे आमफ़हम चीज़ें 
कोई रेतीली जगह 
लगातार बहता नल 
उसका घर बिखरा हुआ 
देखती है कुछ है जो दिखलाई नहीं पड़ता 
कई बार देखने के बाद  आगे पढ़ें

1 month ago

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