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माहेश्वर तिवारी की कविता: गहरे-गहरे से पदचिन्ह

माहेश्वर तिवारी की कविता: गहरे-गहरे-से पदचिन्ह
                
                                                                                 
                            गहरे-गहरे से पदचिह्न ।
                                                                                                


घर की दहलीज़ों के नीचे,
गहरे-गहरे से पदचिह्न।
कल तक जो थे मेरे साथ
दिखते उनसे बिल्कुल भिन्न।
गहरे-गहरे से पदचिह्न।

ताजे पर अपरिचित अनाम
अभी छोड़ गई इन्हें शाम
जाने क्यों हो करके खिन्न।
गहरे-गहरे से पदचिह्न।

कोई चौराहे तक जाए
और इन्हें वहीं छोड़ आए
ऐसा न हो कल के दिन।
गहरे-गहरे से पदचिह्न।
1 month ago

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