मैथिलीशरण गुप्त की कविता: नागरी और हिंदी 

मैथिलीशरण गुप्त की कविता: नागरी और हिंदी
                
                                                             
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है एक-लिपि-विस्तार होना योग्य हिंदुस्तान में—
अब आ गई यह बात सब विद्वज्जनों के ध्यान में।
है किंतु इसके योग्य उत्तम कौन लिपि गुण आगरी?
इस प्रश्न का उत्तर यथोचित है उजागर—‘नागरी’॥

दो

समझें अयोग्य न क्यों इसे कुछ हठी और दुराग्रही,
लिपियाँ यहाँ हैं और जितनी श्रेष्ठ सबसे है यही।
इसका प्रचार विचार से कल्याणकर सब ठौर है,
सुंदर, सरल, सुस्पष्ट ऐसी लिपि न कोई और है॥

तीन

सर्वत्र ही उत्कर्ष इसका हो चुका अब सिद्ध है,
यह सरल इतनी है कि जिससे ‘बालबोध’ प्रसिद्ध है।
अति अज्ञ जन भी सहज ही में जान लेते हैं इसे,
संपूर्ण सहृदय जन इसी से मान देते हैं इसे॥

चार

जैसा लिखो वैसा पढ़ो कुछ भूल हो सकती नहीं,
है अर्थ का न अनर्थ इसमें एक बार हुआ कहीं।
इस भाँति होकर शुद्ध यह अति सरल और सुबोध है,
क्या उचित फिर इसका कभी अवरोध और विरोध है?

पाँच

है हर्ष अब नित बुध जनों की दृष्टि इस पर हो रही,
वह कौन भाषा है जिसे यह लिख सके न सही सही?
लिपि एक हो सकती यही संपूर्ण भारतवर्ष में,
हित है हमारा इसी लिपि के सर्वथा उत्कर्ष में॥ आगे पढ़ें

3 days ago

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