हिंदी दिवस विशेष: चलने न पाए हिंदी के नाम पर ठिठोली- डाॅ ओम निश्चल 

हिंदी दिवस विशेष
                
                                                             
                            पूरब से ले के पश्चिम
                                                                     
                            
उत्तर से ले के दक्खिन
लहजा भले अलग हो, मीठी है उसकी बोली
आओ लगाएं अक्षत माथे पे उसके रोली



यह बह रही सुबह की ठंडी हवा की मानिंद
होठों पे खेलती है बन करके ये ऋचाएं
मिट्टी के व्याकरण से इसका करीबी रिश्ता
सुख-दुख में थपथपाती देती हुई दुआएं

टूटे हुओं को जोड़े
रूठे हुओं को मोड़े
हर दिल अजीज भाषा हर दिल अजीज बोली
आओ लगाएं अक्षत माथे पे इसके रोली आगे पढ़ें

2 days ago

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