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हेमन्त देवलेकर की कविता: मैं जब आरोप लगाता हूँ

हेमन्त देवलेकर की कविता: मैं जब आरोप लगाता हूँ
                
                                                                                 
                            मैं जब आरोप लगाता हूँ
                                                                                                

यह समय भयानक है
तो भूल जाता हूँ
कि उसी समय में धड़कता
एक क्षण मैं भी हूँ
इस तरह सारे आरोप
शुरू मुझसे होते हैं
मैं लगाता हूँ जब यह आरोप
कि चरित्र लोगों के
हो गए पतनशील
तो यह भूल जाता हूँ
उन्हीं लोगों में शामिल हूँ मैं भी
इस तरह सारे संदेह
शुरू मुझसे होते हैं
मैं बाज़ार को कोसते हुए
जब लिखता हूँ कविताओं में आक्रोश
तो यह भूल जाता हूँ
इतनी क़ुव्वत नहीं
कि नकार सकूँ चमकीले प्रलोभन
इस तरह सारे झूठ
शुरू मुझसे होते हैं
1 month ago

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