शांत घड़ी एकांत बसेरा, भीगी संध्या आई है - गोपाल सिंह नेपाली

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                            शांत घड़ी, एकांत बसेरा,
                                                                     
                            
भीगी संध्या आई है।
पावस है चुप बैठे कवि के
लिये फ़ुहारें लाई है!
दो-दो बूंदें टपक रही हैं
इन टीनों के छप्पर से
छोड़ देखना इन बूंदों को
निकले कौन अभी घर से 
यह कवि की प्यारी बेला रे
काले घन की घिर आना
श्रम हरने के लिए शांति में
मन चाहे जब कुछ गाना 
जब आंखों के आगे टपकें
आंखों की जैसी बूंदें
तब पावस का एक अनुभवी 
कवि कैसे आंखें मूंदे ?
गाता है कवि गान, बूंद पर
बूंद टीन से चूती है
नभ से छत पर, छत से आकर
कवि के हिय को छूती है
गाता है कवि गान, धार पर
धार छतों से चलती है
जिसे देख कविता की,
कवि के हिय में, धार मचलती है
इसी धार में फिर मन की 
सब चिन्ताएं बह जाती हैं
विकट परिस्थितियां चक्कर खा 
कर नीचे ढह जाती हैं
रह जाती है एक शिला ही
बस, कवि के दृढ़ जीवन की 
बैठ यही तोड़ करता वह
कड़ियां जग के बंधन की। 
1 month ago

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