धर्मवीर भारती की कविता 'सांझ के बादल'

dharmvir bharti hindi kavita saanjh ke baadal
                
                                                             
                            

ये अनजान नदी की नावें
जादू के-से पाल
उड़ाती
आती
मंथर चाल।

नीलम पर किरनों
की साँझी
एक न डोरी
एक न माँझी ,
फिर भी लाद निरंतर लाती
सेंदुर और प्रवाल!

कुछ समीप की
कुछ सुदूर की,
कुछ चन्दन की
कुछ कपूर की,
कुछ में गेरू, कुछ में रेशम
कुछ में केवल जाल।

ये अनजान नदी की नावें
जादू के-से पाल
उड़ाती
आती
मंथर चाल।

1 month ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X