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भवानीप्रसाद मिश्र की कविता: अपने को आप जैसा पाया मैंने

भवानीप्रसाद मिश्र की कविता: अपने को आप जैसा पाया मैंने
                
                                                                                 
                            एक क्षण के लिए जब
                                                                                                

अपने को आप जैसा पाया मैंने
आसमान तब
सिर पर उठाया मैंने
और दे मारा मैंने उसे
ज़मीन पर
हँसी आ गयी तब मुझे
उस क्षण यह सोचकर
कि कितना इसका शोर था
इसी में रात थी
इसी में भोर था
और अब यह
यों छार छार पड़ा है

आपके जैसा होने का मज़ा
ख़ासा बड़ा है
मगर एक क्षण के लिए
सदा तत्पर नहीं रह सकता मैं
इतने निरर्थक रण के लिए
जिसमें आसमान
सिर पर उठाना पड़ता हो
पटकना पड़ता हो जिसमें
सूरज को ज़मीन पर!
4 weeks ago

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