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Hindi Kavita: बालकृष्ण शर्मा नवीन की रचना- पराजय गीत

कविता
                
                                                                                 
                            

आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ,


विजय पताका झुकी हुई है, लक्ष्यभ्रष्ट यह तीर हुआ,
बढ़ती हुई क़तार फ़ौज की सहसा अस्त-व्यस्त हुई,
त्रस्त हुई भावों की गरिमा, महिमा सब संन्यस्त हुई;
मुझे न छेड़ो, इतिहासों के पन्नो, मैं गतधीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!

मैं हूँ विजित, जीत का प्यासा विजित, भूल जाऊँ कैसे?
वह संघर्षण की घटिका है बसी हुई हिय में ऐसे,—
जैसे माँ की गोदी में शिशु का दुलार बस जाता है,
जैसे अंगुलीय में मरकत का नवनग कस जाता है;
'विजय-विजय' रटते-रटते मेरा मनुआ कल-कीर हुआ,
फिर भी असि की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!

गगन भेद कर वरद करों ने विजय प्रसाद दिया था जो,
जिसके बल पर किसी समय में मैंने विजय किया था जो,
वह सब आज टिमटिमाती स्मृति-दीपशिखा बन आया है,
कालांतर ने कृष्ण आवरण में उसको लिपटाया है,
गौरव गलित हुआ, गुरुता का निष्प्रभ क्षीण शरीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
 

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1 month ago

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