आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अशोक वाजपेयी की कविता: उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम

कविता
                
                                                                                 
                            उसकी खिड़की खुली है,
                                                                                                

उसके आँगन में गूँज रहा है दुख,
उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम।

उसकी सुन्दरता ने बनाया है घर,
उसकी चाहत ने डाला है छप्पर,
उसकी उदासी ने खींचे हैं परदे।

वह कुछ कहती नहीं है
पर उसकी आँखों में डबडबाते हैं शब्द,
उसके इशारों में डूबते-उतराते हैं नक्षत्र,
वह आकाश में कौंधती है बिजली की तरह,
वह उगती है वृक्ष की तरह पृथ्वी पर। आगे पढ़ें

2 months ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X