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waseem barelvi ghazal jahan dariya kahin apne kinare

इरशाद

जहां दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है - वसीम बरेलवी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जहां दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है
कोई उठता है और तूफ़ान का रुख़ मोड़ देता है

मुझे बे-दस्त-ओ-पा कर के भी ख़ौफ़ उस का नहीं जाता
कहीं भी हादिसा गुज़रे वो मुझ से जोड़ देता है

बिछड़ के तुझ से कुछ जाना अगर तो इस क़दर जाना
वो मिट्टी हूं जिसे दरिया किनारे छोड़ देता है

मोहब्बत में ज़रा सी बेवफ़ाई तो ज़रूरी है
वही अच्छा भी लगता है जो वादे तोड़ देता है

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