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trilochan hindi kavita sachmuch idhar tumhari yaad toh nahin aayi

इरशाद

सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई - त्रिलोचन

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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सचमुच, इधर तुम्हारी याद तो नहीं आई,
झूठ क्या कहूं। पूरे दिन मशीन पर खटना,
बासे पर आकर पड़ जाना और कमाई 
का हिसाब जोड़ना, बराबर चित्त उचटना।
 
इस उस पर मन दौड़ाना। फिर उठकर रोटी 
करना। कभी नमक से कभी साग से खाना। 
आरर डाल नौकरी है। यह बिलकुल खोटी 
है। इसका कुछ ठीक नहीं है आना जाना। 

आए दिन की बात है। वहां टोटा-टोटा 
छोड़ और क्या था। किस दिन क्या बेचा-किना। 
कमी अपार कमी का ही था अपना कोटा,
नित्य कुआं खोदना तब कहीं पानी पीना।

धीरज धरो, आज कल करते तब आऊंगा , 
जब देखूंगा अपने पुर कुछ कर पाऊंगा।


साभार- कविताकोश 

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