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शमशेर बहादुर सिंह: कुछ भी देख नहीं मैं पाता! कौन पाप हैं पूर्व-जन्म के...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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महान कवि शमशेर बहादुर सिंह हिन्दी-साहित्य के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, उनके शब्दों की तुकबंदी की लयबद्धता एक संगीत उत्पन्न करती है। वह दूसरा तार सप्तक के संवेदनशील कवि हैं और भावनाओं की गहराई में डूबकर शब्दों के मोती चुनते हैं। पढ़ते हैं इन्हीं शब्द-मोती से गढ़ी गई यह नायाब कविता...

आज हृदय भर-भर आता है,
सारा जीवन रुक-सा जाता;
वह आँखों में छाए जाते 
कुछ भी देख नहीं मैं पाता !
कौन पाप हैं पूर्व-जन्म के,
जिनका मुझको फल मिलता है?
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