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Sufi tabassum ghazal sau baar chaman mehka

इरशाद

सूफ़ी तबस्सुम की ग़ज़ल ‘सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई'

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई
दुनिया की वही रौनक़ दिल की वही तन्हाई

इक लहज़ा बहे आँसू इक लहज़ा हँसी आई
सीखे हैं नए दिल ने अंदाज़-ए-शकेबाई

इस मौसम-ए-गुल ही से बहके नहीं दीवाने
साथ अब्र-ए-बहाराँ के वो ज़ुल्फ़ भी लहराई
(अब्र-ए-बहाराँ - बरसात के बादल)

हर दर्द-ए-मोहब्बत से उलझा है ग़म-ए-हस्ती
क्या क्या हमें याद आया जब भी तिरी आई

चरके वो दिए दिल को महरूमी-ए-क़िस्मत ने
अब हिज्र भी तन्हाई और वस्ल भी तन्हाई

देखे हैं बहुत हम ने हंगामे मोहब्बत के
आग़ाज़ भी रुस्वाई अंजाम भी रुस्वाई

ये बज़्म-ए-मोहब्बत है इस बज़्म-ए-मोहब्बत में
दीवाने भी शैदाई फ़रज़ाने भी शैदाई
(फ़रज़ाने - बुद्धिमान) 

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