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Sudarshan faakir thumri by begum akhtar humari atariya pe aao sanwariya

इरशाद

सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी ठुमरी जिसे फ़ैज़ बार-बार बेग़म अख़्तर से सुनते थे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हमरी अटरिया पे आओ संवरिया 
देखा देखी बलम होई जाए

तसव्वुर में चले आते हो कुछ बातें भी होती हैं
शबे-फ़ुर्रक भी होती है मुलाक़ातें भी होती हैं

हमरी अटरिया पे आओ संवरिया
देखा देखी बलम होई जाए

प्रेम की भिक्षा मांगे भिकारन
लाज हमारी रखियो साजन

आओ सजम तुम हमरे द्वारे
सारा झगड़ा ख़तम होई जाए

हमरी अटरिया पे आओ संवरिया
देखा देखी बलम होई जाए

तुम्हारी याद आंसू बनके आयी चश्मे वीरां में
ज़हे क़िस्मत की वीरानों में बरसातें भी होती हैं

हमरी अटरिया पे आओ संवरिया
देखा देखी बलम होई जाए
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