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रामधारी सिंह दिनकर

इरशाद

जेठ नहीं, यह जलन हृदय की, उठकर जरा देख तो ले: रामधारी सिंह "दिनकर"

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जेठ नहीं, यह जलन हृदय की,
उठकर जरा देख तो ले;
जगती में सावन आया है,
मायाविन ! सपने धो ले।

जलना तो था बदा भाग्य में
कविते ! बारह मास तुझे;
आज विश्व की हरियाली पी
कुछ तो प्रिये, हरी हो ले। आगे पढ़ें

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